शिक्षा वो भी है जो वक्त परिस्थिति तथा अपने अनुभव से प्राप्त की जाती है |

                  शिक्षा वो भी है जो वक्त परिस्थिति तथा अपने अनुभव से प्राप्त की जाती है       
                    
                                यदि आप ऐसा मानते हैं तो इस लेख को एक बार जरूर पढ़ें 

यातायात के साधनों के साथ - साथ मनोरंजन , खेल - कूद ,फैशन से लेकर शिक्षा और प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में अविश्वसनीय प्रगति हमारे देश में हुई है | सुख - सुविधाओं में वृद्धि होने के बावजूद भी हर व्यक्ति अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता में रहता है| और इसी वजह से भारी तनाव महसूस करता है| बच्चों की अच्छी परवरिश तनाव को कम करने में मददगार हो सकती है| परवरिश यानि लालन-पालन हर माँ-बाप की इच्छा होती है की वो बच्चों की परवरिश बहुत अच्छी तरह से करें| उन्हें अच्छी शिक्षा दें, संस्कार दें ताकि समाज में उनकी और उनके बच्चों की प्रतिष्ठा बनें | और अपने पूर्वजों का सम्मान बना रहें | लेकिन विडम्बना यह है की लाख चाहने के बावजूद कहीं न कहीं हमें इस बात का मलाल रहता है की जैसा हम चाहते थे वैसा नहीं हुआ | इस बात का अफ़सोस करते हुए लोगो  से  सुना जा सकता है की कही  न कही  हमारी  परवरिश में कमी रही होगी  |
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यही वजह है कि बड़े होकर बच्चे माँ - बाप से संतुष्ट नहीं होते और माँ - बाप बच्चों से | कारण यह नहीं हे की माँ बाप ने कोई कमी रखी या बच्चों ने कोशिश नहीं की बल्कि आज हम बच्चों की परवरिश का मतलब नहीं समझ पा रहें हे| आज हम सिर्फ स्कूली शिक्षा और बच्चों के कैरियर को ही परवरिश समझ रहें हैं| स्कूली शिक्षा के साथ - साथ घर की पाठशाला और समाज की पाठशाला में भीं बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए नैतिक शिक्षा अति आवश्यक है  | बच्चों के कॅरियर के लिए हम इतने सतर्क हो गए हैं की स्कूली शिक्षा को ही हम प्राथमिकता दे रहे हैं| घर की पाठशाला और समाज की पाठशाला से बच्चे को दूर रख रहें हैं| बच्चे का भविष्य बनाने के लिए हम उसका सारा ध्यान किताबी शिक्षा पर लगा रहें हैं |   जिससे बच्चे का बौद्धिक विकास तो हो रहा हे परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप से वह तनाव ग्रस्त हो रहा है तनाव से बचने के लिए उसका बौद्धिक विकास के साथ - साथ सामाजिक , मानसिक और शारीरिक विकास भी ज़रूरी है | 
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दूसरी बात आज हम बचपन से ही बच्चों को इस भोतिक युग का अहसास करा देते हैं| बच्चों के खाने से 
लेकर कपडे और क्षिक्षा भी हम उसे रेडीमेट दे रहें हैं| उसे खुद हम कुछ करने का मौका ही नहीं दे रहे| जब तक बच्चा खुद प्रयोग नहीं करेगा तब तक वह सीख नहीं पाएगा| हम बच्चों को बचपन से ही सुख सुविधाओं का आदि बना रहें हैं|  उसे छोटी सी असुविधा होने पर वह अपना काम आगे नहीं बढ़ाता हे| 

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 हम इतने आधुनिक और एडवांस हो गए हैं की छोटी- छोटी तकलीफों का हल निकालने के लिए भी हम बड़ बड़ा पैसा खर्च कर देते हैं| घरूले नुस्खे हम बिलकुल भूल गए हैं| बुजुर्गों से हम बच्चों का तालमेल यह सोचकर नहीं बनने देते हैं की कहीं पुराने ख़यालों और पुरानी सोच से हमारा बच्चा पिछड़ नहीं जाए| और यही कारण हे की कई बार बच्चे आपके द्वारा दी गई नसीहतों को भी बाईपास कर जातें हैं| क्योंकि इस आधुनिक  होते समाज मेंआपके द्वारा दी गई नसीहत भी पुराने ख़यालों की लगने लगती हैं|                                                             
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हमें बच्चों की ही नहीं बल्कि बुजुर्गों की और हमारी भी जायज  सुख - सुविधाओं और समस्याओं का ध्यान रखना चाहिए | बच्चों की परवरिश इस तरह से होनी चाहिए की अभावों में भी अपने परिवार के साथ सुख शांति और सुकून की ज़िन्दगी जी सके| क्योंकि समय का कोई भरोसा नहीं होता| आज आपके साथ हर परिस्थिति अनुकूल हे लेकिन कब परिस्तिथि विपरीत हो जाए ये कहा नहीं जा सकता | 
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 आज जो लोग आपके दोस्त हैं उनसे किस बात पर दुश्मनी हो जाए और कब आपकी दोस्ती दुश्मनी में बदल जाए पता नहीं हैं| पता नहीं कब आपका स्वास्थय जवाब दे जाए, पता नहीं कब आपके काम धंधे और बिज़नस का समय बदल जाए, इन सब बातों का ध्यान रखते हुए बच्चों की परवरिश करें| भूत ,  भविष्य  में 
 तालमेल  बैठाये  सामाजिक परवरिश हमारे  तथा  बच्चों  के तनाव को कम करने में निश्चित रूप से मददगार होगी |  शिक्षा सिर्फ वो नहीं है जो किताबों  के माध्यम से दी और ली  जाती है  शिक्षा वो भी है जो वक्त परिस्थिति तथा अपने अनुभव से प्राप्त की जाती है |                                       


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