कहीं अपनापन पराये लोगों से मिल रहा है तो कहीं परायापन अपने लोगों से मिल रहा है

January 13, 2020
आज हम जीवन को पूर्ण रूप से कृत्रिम बना चुकें हैं जो चीज़ प्रकृति ने हमें उपहार में दी है उसे भी हम भोतिक रूप से कृत्रिम बना चुकें हैं | प्रेम, प्यार, भावनाएं, स्वभाव ये सब प्राकृतिक होतें हैं | लेकिन हम इन्हे भी कृत्रिम रूप से प्रदर्शित कर रहें हैं | नफरत, गुस्सा, क्रोध भी हम स्वाभाविक रूप से प्रदर्शित नहीं कर पा रहें हैं | 

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यही वजह है की हर इंसान हमें गिरगिट की तरह रंग बदलता हुआ नज़र आ रहा है | सोचकर देखें क्यों कोई अपना सा लगने के बाद भी कुछ ही दिनों में पराया सा लगने लगता है ? क्यों जिसे हम बहुत ज़्यादा चाहने लगतें हैं कुछ ही दिनों में अनजान सा लगने लगता है ? क्यों हमें लोग अचानक ही बदलते से नज़र आने लगतें हैं ? क्यों हम किसी को पहचानने में भी बड़ी भूल करते नज़र आने लगतें हैं ?

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क्यों किसी व्यक्ति को जिससे हमें बहुत उम्मीद होती है जो हमारा परम हितेषी लगने लगता है उससे दूरी बनाने लगतें हैं ? ऐसी कई सारी बातें हैं जो इस बात को साबित करती है की क्यों इंसान अपनी स्वाभाविक पहचान छिपाना चाहता है क्यों अपने को पराया और पराये को अपना बनाना चाहता है ?

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 हम भौतिक सुख सुविधाओं के इस माया जाल में अपने और परायेपन का प्राकृतिक आनंद खोते जा रहें हैं कहीं अपनापन पराये लोगों से मिल रहा है तो कहीं परायापन अपने लोगों से मिल रहा है |अपने पराये का यह भेद मन से मिटाना होगा तब हम सबके और सब हमारे होंगे | 

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