अच्छा नहीं हैं बेवजह लड़ना लड़ाना

November 04, 2018
कुछ लोग लड़ाई का नाम सुन कर ही घबरा जाते हैं| डर के मारे कांपने लगते हैं, दुखी हो जाते हैं, मन छोटा कर लेते हैं| सच भी है क्योंकि लड़ाई झगड़ा अच्छी बात नहीं है | इसके विपरीत कुछ लोग इसी मौके की तलाश में रहते हैं, लड़ाई शुरू कैसे की जाए ? उन्हें बेवजह लड़ाई लड़ने, देखने, लड़वाने में ही मजा आता है| ऐसे लोग एक दूसरे को लड़वाने में माहिर होते हैं और खुद दूर बैठ कर मजा लेते हैं| छोटी-छोटी बातों में बड़ी - बड़ी लड़ाइयां आज आम बात हो गई है न तो हमारे पास लड़ाई लड़ने के तर्कसंगत कारण है न ही कोई बड़ी वजह| 
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बिना बातचीत के बिना फाटक की रेल लाइन की तरह सीधे गाली - गलोच, गोली बन्दुक की लड़ाई जिसे युद्ध कहा जा सकता है | जिसे देखो युद्ध लड़ने और लड़वाने को  तैयार रहता है| लोगों को तो किसी कृष्ण अवतार की भी आवश्यकता नहीं है जो गीता का उपदेश सुनाकर युद्ध लड़ने का अभिप्राय समझा सके | पहली बात तो अभिप्राय हम समझना ही नहीं चाहते यदि हम अभिप्राय समझना ही चाहते तो इतनी बड़ी महाभारत से ही हम कुछ सीख सकते थे|
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कुछ नहीं सीखने के कई कारण हो सकते हैं| शायद कृष्ण भी हम ही बनना चाहते हैं और कंस भी , कौरव भी हम ही बनना चाहते हैं और पांडव भी, राम भी हम ही बनना चाहते हैं और वक्त आने पर रावण भी हम ही बन जाते हैं तब हमें न तो गीता के उपदेश याद रहते हैं न रामायण की चौपाइयां , न हमें कुरान याद आती है, न बाइबल, न हमें राम धुन याद आती है, न बुद्धम शरणम गच्छामि| हम तो यह भी भूल जाते हैं कि जिससे हम लड़ रहें हैं कहीं वह हमारे हित की बात या सामाजिक हित की बात तो नहीं कर रहा है| मतलब सिर्फ इस बात से रहता है की युद्ध लड़ना है| राम और कृष्ण तो बन नहीं सकते रावण और कंस बनकर लड़ते झगड़ते मरना भी मंजूर कर लेते हैं कैसी विडम्बना और कैसी लड़ाई हे यह ?



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