शुद्ध हास्य के लिए पारिवारिक एवं सामाजिक सीमाओं का ध्यान रखना भी ज़रूरी है |

August 11, 2018
हास्य एक स्वाभाविक क्रिया है लोगों को हंसाने के लिए उसमे बनावटी पन लाकर कुछ समय के लिए तो हंसाया जा   सकता है लेकिन शुद्ध हास्य के लिए पारिवारिक एवं सामाजिक सीमाओं का ध्यान  रखना भी ज़रूरी है | आज हास्य का मतलब हो गया है एक दूसरे पर हंसना जब हास्य का मतलब ही एक दूसरे पर हंसना हो जाये तो ऐसे  हास्य का हास् यानी  पतन होना शुरू हो जाता है  है |
 हास्य वही  अच्छा लगता है जब सामूहिक रूप से हंसा जाये ऐसी फूहड़ता जिसे कुछ लोग तो एक दूसरे को नीचे दिखने के लिए हंस रहे है कुछ लोग गर्दन  नीची किये हुए भी देख रहे हैं और हंस रहे हैं कुछ ऐसे भी लोग होंगे जिनका सिर ऐसे  भद्दे कमैंट्स और छोटे कपड़ों के फैशन के  हास्य से  झुक जाता है |   कई बार ऐसे द्र्श्यो पर दुनिया ठहाके लगा कर हंसती है और कुछ लोग शर्म से पानी पानी हो जाते है |
 ऐसे कॉमेडी सीरियल्स और फिल्में   बनाकर पैसा कमाया जा सकता है परन्तु अच्छे श्रोता और दर्शक नहीं जुटाए जा सकते न ही आधुनिक युग को हास्य का असली मज़ा दिया  जा सकता है  |    भद्देपन और फूहड़ता की हदों ने समाज के नज़रिये को प्रभावित किया है बच्चे इन भद्दे और अतरंग दृश्यों को देखकर विचलित हो रहे हैं कच्ची उम्र में सोच कच्ची होती है आज कल के उटपटांग और अमर्यादित हास्य को बच्चे भी देख रहे हैं जिसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं |
 आधुनिक कॉमेडी के नाम पर समाज में हास्य नहीं बल्कि परिवारों में जहर घोला जा  रहा है जो कैंसर  की तरह ला इलाज होता जा रहा है | आधुनिक होना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन आधुनिकता और हास्य के नाम पर घटनाओं  को तोड़ मरोड़ कर परोस कर समाज का स्वास्थ्य बिगाड़ना किसी भी कीमत पर हास्य की श्रेणी में नहीं आ  सकता |  हास्य एक विधा है जिसे सामाजिक गंदगी से   बचाने  के लिए तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसे सीरियल्स की आवश्यकत है चुप चुप के ,हसीना  मान जाएगी ,मालामाल वीकली जैसी शुध्द  हास्य प्रधान फिल्मो की आवश्यकता है  | 

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